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Friday, 14 October 2016

कोणार्क सूर्य मंदिर

कोणार्क सूर्य मंदिर


देश में सूर्य मंदिर के रूप में अगर कोई नाम सबसे पहले उभरकर आता है तो वह है कोणार्क का सूर्य मंदिर। उड़ीसा में पुरी से 35 किलोमीटर दूर समुद्र के किनारे चंद्रभागा तट से थोड़ी ही दूर स्थित यह मंदिर 13वीं सदी में राजा नरसिंहदेव द्वारा बनवाया गया था। शिल्प की दृष्टि से यह पूरे भारत में सबसे बेजोड़ मंदिरों में से एक है, जिसकी तुलना में सिर्फ खजुराहो के मंदिरों को खड़ा किया जा सकता है। यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत स्थलों की सूची में शामिल किया है। सूर्य की उपासना को समर्पित यह मंदिर सूर्य के रथ के आकार में बनाया गया है। सामने की तरफ सात घोड़े हैं और दोनों तरफ बारह पहिये हैं। घोड़ों के तो अब केवल भग्नावशेष ही बचे हैं, लेकिन पहिए अब भी उसी भव्यता के साथ मौजूद हैं और वहां आने वालों के लिए बड़ा आकर्षण हैं। मुख्य मंदिर
का गर्भगृह अब देखा नहीं जा सकता। जब मंदिर को नुकसान पहुंचने लगा तो सौ साल से भी ज्यादा समय हुए अंग्रेजों ने उसे अंदर से पूरी तरह भरवाकर बंद कर दिया। लेकिन वहां जाने वाले सैलानियों की संख्या और उनकी आस्था में कोई कमी नहीं आई।
कोणार्क सूर्य मंदिर 13 वी शताब्दी का सूर्य मंदिर है जो भारत के ओडिशा राज्य के कोणार्क में स्थित है. ऐसा माना जाता है की यह मंदिर पूर्वी गंगा साम्राज्य के महाराजा नरसिंहदेव 1 ने 1250 CE में बनवाया था. यह मंदिर बहोत बडे रथ के आकार में बना हुआ है, जिसमे कीमती धातुओ के पहिये, पिल्लर और दीवारे बनी है. मंदिर का मुख्य भाग आज विनाश की कगार पर है. आज यह मंदिर UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज साईट में भी शामिल है और साथ ही यह मंदिर भारत के 7 आश्चर्यो में भी शामिल है.
कोणार्क मंदिर का इतिहास 
भविष्य पुराण और साम्बा पुराण के अनुसार उस क्षेत्र में इस मंदिर के अलावा एक और सूर्य मंदिर था, जिसे 9 वी शताब्दी या उससे भी पहले देखा गया था. इन किताबो में मुंडीरा (कोणार्क), कलाप्रिय (मथुरा) और मुल्तान में भी सूर्य मंदिर बताये गए है.

धर्मग्रन्थ साम्बा के अनुसार, कृष्णा के बेटे को कुष्ट रोग का श्राप था. उन्हें ऋषि कटक ने इस श्राप से बचने के लिये सूरज भगवान की पूजा करने की सलाह दी. तभी साम्बा ने चंद्रभागा नदी के तट पर मित्रवन के नजदीक 12 सालो तक कड़ी तपस्या की. दोनों ही वास्तविक कोणार्क मंदिर और मुल्तान मंदिर साम्बा की ही विशेषता दर्शाते है.
एरीथ्रैअन सागर (पहली सदी CE) के पास एक बंदरगाह भी था जिसे कैनपरा कहा जाता था, और उसी को आज कोणार्क कहा जाता है.
जब कभी भी परंपरा, रीती-रिवाज और इतिहास की बात आती है तो भारत का हर एक मंदिर लोगो को आकर्षित करता है.
कोणार्क नाम विशेषतः कोना- किनारा और अर्क – सूर्य शब्द से बना है. यह पूरी और चक्रक्षेत्र के उत्तरी-पूर्वी किनारे पर बसा हुआ है.
कोणार्क मंदिर वास्तु-कला 
वैसे यह मंदिर असल में चंद्रभागा नदी के मुख में बनाया गया है लेकिन अब इसकी जलरेखा दिन ब दिन कम होती जा रही है. यह मंदिर विशेषतः सूरज भगवान के रथ के आकार में बनाया गया है. सुपरिष्कृत रूप से इस रथ में धातुओ से बने चक्कों की 12 जोड़िया है जो 3 मीटर चौड़ी है और जिसके सामने कुल 7 घोड़े (4 दाई तरफ और 3 बायीं तरह) है. इस मंदिर की रचना भी पारंपरिक कलिंगा प्रणाली के अनुसार ही की गयी है. और इस मंदिर को पूर्व दिशा की ओर या तरह बनाया गया है की सूरज की पहली किरण सीधे मंदिर के प्रवेश पर ही गिरे. खोंदालिट पत्थरो से ही इस मंदिर का निर्माण किया गया था.
वास्तविक रूप से यह मंदिर एक पवित्र स्थान है, जो 229 फ़ीट (70 मी.) ऊँचा है. इतना ऊँचा होने की वजह से और 1837 में वहाँ विमान गिर जाने की वजह से मंदिर को थोड़ी बहोत क्षति भी पहोची. मंदिर में एक जगमोहन हॉल (ऑडियंस हॉल) भी है जो तक़रीबन 128 फ़ीट (30 मी.) लंबा है, और आज भी वह हॉल जैसा के वैसा ही है.
वर्तमान में इस मंदिर में और भी कई हॉल है जिसमे मुख्य रूप से नाट्य मंदिर और भोग मंडप शामिल है.
कोणार्क मंदिर अपनी कामोत्तेजक मूर्तिवश मैथुन के लिये भी जाना जाता है.
इस मंदिर के आस-पास 2 और विशाल मंदिर पाये गए है. जिसमे से एक महादेवी मंदिर जो कोणार्क मंदिर के प्रवेश द्वार के दक्षिण में है. ऐसा माना जाता है की महादेवी मंदिर सूरज भगवान की पत्नी का मंदिर है. इस मंदिर को 11 वी शताब्दी के अंत में खोजा गया था. कोणार्क मंदिर के पास का दूसरा मंदिर वैष्णव समुदाय का है. जिसमे बलराम, वराह और त्रिविक्रम की मुर्तिया स्थापित की गयी है, इसीलिये इसे वैष्णव मंदिर भी कहा जाता है. लेकिन दोनों ही मंदिर की मुलभुत मुर्तिया गायब है.
मंदिरो से गायब हुई बहोत सी मूर्तियो को कोणार्क आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम में देखा गया था.

मंदिर के पहिये धूपघड़ी का काम करते है जिसकी सहायता से हम दिन-रात दोनों ही समय सही समय का पता लगा सकते है

आइये कोणार्क मंदिर की कुछ रोचक बातो के बारे में जानते है 
1. रथ के आकार का निर्माणकार्य-
कोणार्क मंदिर का निर्माण रथ के आकार में किया गया है जिसके कुल 24 पहिये है.
रथ के एक पहिये का डायमीटर 10 फ़ीट का है और रथ पर 7 घोड़े भी है.
2. यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साईट
आश्चर्यचकित प्राचीन निर्माण कला का अद्भुत कोणार्क मंदिर यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साईट में शामिल है. ये सम्मान पाने वाला ओडिशा राज्य का वह अकेला मंदिर है.
3. नश्वरता की शिक्षा –
कोणार्क मंदिर के प्रवेश भाग पर ही दो बड़े शेर बनाये गए है. जिसमे हर एक शेर को हाथी का विनाश करते हुए बताया गया है. और इंसानी शरीर के अंदर भी एक हाथी ही होता है.
उस दृश्य में शेर गर्व का और हाथी पैसो का प्रतिनिधित्व कर रहे है.
इंसानो की बहोत सी समस्याओ को उस एक दृअह्य में ही बताया गया है.
4. सूर्य भगवान को समर्पित –
मंदिर में सूर्य भगवान की पूजा की जाती है.
मंदिर का आकार एक विशाल रथ की तरह है और यह मंदिर अपनी विशेष कलाकृति और मंदिर निर्माण में हुए कीमती धातुओ के उपयोग के लिये जाना जाता है.
5. मंदिर के रथ के पहिये धुपघडी का काम करते है और सही समय बताते है
इस मंदिर का मुख्य आकर्षन रथ में बने 12 पहियो की जोड़ी है. ये पहिये को साधारण पहिये नही है क्योकि ये पहिये हमें सही समय बताते है, उन पहियो को धूपघड़ी भी कहा गया है.
कोई भी इंसान पहियो की परछाई से ही सही समय का अंदाज़ा लगा सकता है.
6. निर्माण के पीछे का विज्ञान
मंदिर में ऊपरी भाग में एक भारी चुंबक लगाया गया है और मंदिर के हर दो पत्थरो पर लोहे की प्लेट भी लगी है. चुंबक को इस कदर मंदिर में लगाया गया है की वे हवा में ही फिरते रहते है.
इस तरह का निर्माणकार्य भी लोगो के आकर्षण का मुख्य कारण है, लोग बड़ी दूर से यह देखने आते है.

7. काला पगोडा –
कोणार्क मंदिर को पहले समुद्र के किनारे बनाया जाना था लेकिन समंदर धीरे-धीरे कम होता गया और मंदिर भी समंदर के किनारे से थोडा दूर हो गया. और मंदिर के गहरे रंग के लिये इसे काला पगोडा कहा जाता है और नकारात्मक ऊर्जा को कम करने के लिये ओडिशा में इसका प्रयोग किया जाता है

उड़ीसा राज्य के पवित्र शहर पुरी के पास कोणार्क का सूर्य मंदिर स्थित है। यह भव्य मंदिर सूर्य देवता को समर्पित है और भारत का प्रसिद्घ तीर्थ स्थल है। सूर्य देवता के रथ के आकार में बनाया गया यह मंदिर
सूर्य मंदिर समय की गति को भी दर्शाता है, जिसे सूर्य देवता नियंत्रित करते हैं। पूर्व दिशा की ओर जुते हुए मंदिर के 7 घोड़े सप्ताह के सातों दिनों के प्रतीक हैं।

Thursday, 28 July 2016

ये हैं धरती का स्वर्ग

              हिमालय की गोद में बसा, जम्मू और कश्मीर अपनी नेचुरल ब्यूटी के लिए दुनिया भर में अपना एक ख़ास मुकाम रखता है।  जम्मू और कश्मीर मूल रूप से तीन क्षेत्रों में अपनी सीमा को शेयर करता है यानी  इसमें  कश्मीर घाटी, जम्मू और लद्दाख और हिमाचल प्रदेश और पंजाब राज्य शामिल है। भारत के अंतर्गत आने वाला जम्मू और कश्मीर एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण है जिससे अपनी छुट्टी बिताने के लिए पर्यटक साल में कभी भी यहां आ सकते हैं।  यह जगह प्रकृति के प्रेमियों के अलावा साहसिक गतिविधियों में लिप्त  उत्साही लोगों के दिल में एक खास मुकाम रखती है। आपको बताते चलें की प्रसिद्ध मुगल सम्राट जहाँगीर, भी हमेशा ही इस जगह के कसीदे कहते थे बादशाह का ये मानना था की यदि धरती पर कहीं स्वर्ग है तो वो यहीं है। कश्मीर दुनिया की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है साथ ही यहाँ के शानदार पर्वत श्रृंखला, क्रिस्टल स्पष्ट धारा, मंदिर, ग्लेशियर, और उद्यान इस जगह की भव्यता में चार चाँद लगाते हैं।


जम्मू एवं कश्मीर का मौसम

             जम्मू एवं कश्मीर साल में कभी भी जाया जा सकता है फिर भी इस जगह की यात्रा के लिए सबसे अच्छा समय मार्च और अक्टूबर के महीने के बीच है। इस दौरान यहाँ का मौसम और जलवायु सुखद रहती है जिस कारण यहाँ का सौंदर्य निखर कर सामने आता है साथ ही साइट सीइंग की दृष्टि से भी ये एक आदर्श समय है। राज्य का ज्यादातर हिस्सा सर्दियों यानी दिसम्बर से मार्च  के दौरान बर्फ से ढंका रहता है इस समय यहाँ आने वाले पर्यटक बर्फ के खेलों का भी आनंद ले सकते हैं। जम्मू की यात्रा का सबसे उत्तम समय सितम्बर से मार्च के बीच का है, जबकि यहाँ आने वाले पर्यटकों को यदि लद्दाख की यात्रा करनी है तो वो लद्दाख जाने का प्लान गर्मियों में ही बनाएं क्यूंकि सर्दियों में लद्दाख का मौसम बड़ा कठोर रहता है।

जम्मू एवं कश्मीर की भाषाएँ

            जम्मू और कश्मीर राज्य की सरकारी भाषा उर्दू है जो फारसी लिपि में लिखी जाती है जो पूरे राज्य में व्यापक रूप से बोली भी जाती है लेकिन अगर कश्मीर की बात की जाये तो वहां उर्दू का चलन ज्यादा है। राज्य में बोली जाने वाली अन्य भाषाओँ में कश्मीरी, उर्दू, डोगरी, पहाड़ी, बल्टी , लद्दाखी, गोजरी, शिना, और पश्तो शामिल हैं।

जम्मू और कश्मीर में पर्यटन

           जम्मू एवं कश्मीर भारत का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है जिसमें श्रीनगर को ग्रीष्मकालीन राजधानी और जम्मू को शीतकालीन राजधानी माना जाता है ।  पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला और शक्तिशाली हिमालय का सेट राज्य की शोभा ,में चार चाँद लगा देता है साथ ही ये जगह साहसिक उत्साही, प्रकृति प्रेमियों, और तीर्थयात्रियों के लिए मस्ट टू गो प्लेस है।

           यहाँ जम्मू में  अमर महल संग्रहालय और डोगरा कला संग्रहालय  हैं जो कला प्रेमियों के बीच खासे लोकप्रिय हैं और कला का हर कद्रदान एक बार जरूर यहाँ जाना चाहेगा। यहाँ के धार्मिक गंतव्यों में वैष्णो देवी, दरगाह गरीब शाह, बहू मंदिर, जियारत बाबा बुद्दन शाह, शिव खोरी, और सहकर्मी खो गुफा मंदिर शामिल हैं।  साफ नीला पानी, पहाड़, झील, और सुखद जलवायु कश्मीर की घाटी के सबसे प्रमुख विशेषताएं  में से एक है । सेब और चेरी के बागान , शिकारे और ट्रकों की सवारी,हाउसबोट और कश्मीरी हस्तशिल्प इस जगह के सौंदर्य को और भी अधिक अद्वितीय और आकर्षक बना देते हैं।

          यहाँ कई सारी प्रमुख मस्जिदें और मंदिर  जैसे हजरतबल मस्जिद, जामा मस्जिद, चरार-ए -शरीफ, खीर भवानी मंदिर, मार्तंड सूर्य मंदिर, और शंकराचार्य राज्य को एक प्रमुख तीर्थ स्थल बनाते हैं । यहाँ आने वाले पर्यटक निशात गार्डन, शालीमार गार्डन, और चश्म - ए - शाही गार्डन, जो बीते मुगल साम्राज्य की संपन्नता का प्रतिनिधित्व करते हैं जरूर जाएं वो इनको देखकर इतना मन्त्रमुग्ध हो जाएंगे की फिर इस जगह की तारीफ करने से अपने को नहीं रोक पाएंगे।

          यहाँ पहलगाम, सोनमर्ग, पटनीटॉप, द्रास, गुलमर्ग, और कारगिल जैसी जगहें अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध हैं।  डल झील और नागिन झील का शुमार यहाँ की प्रसिद्ध झीलों में होता है। साथ ही यहाँ आने वाले पर्यटक विभिन्न राष्ट्रीय पार्क और कश्मीर स्थित दाचीगम वन्य जीवन अभयारण्य,गुलमर्ग बायोस्फीयर रिजर्व, हेमिस हाई आल्टीटयूट वन्यजीव अभयारण्य, और ओवेरा नेशनल पार्क आदि देख सकते हैं जो प्रकृति प्रेमियों और जीव जंतुओं में इंटरेस्ट रखने वालों के लिए बिलकुल स्वर्ग जैसा है।

           

Saturday, 23 July 2016

जहां बंद गाड़ी भी अपने आप चढ़ने लगती है पहाड़ी पर

           सोचिए अगर आपने रात को गाड़ी जहां खड़ी की है सुबह उठे और आपको अपनी गाड़ी नहीं दिखाई दे, फिर क्या बीतेगा आप पर। आप पहली बार में यही सोचेंगे कि किसी ने आपकी गाड़ी चोरी कर ली है।
लेकिन अगर आप लद्दाख के लेह क्षेत्र में उस रहस्यमय पहाड़ी के आस-पास गाड़ी पार्क करते हैं और सुबह गाड़ी नहीं मिले तो समझ लीजिए किसी चोर ने नहीं बल्कि पहाड़ी ने आपकी गाड़ी को ऊपर खींच लिया। यह कैसे होता है यह एक रहस्य बना हुआ है।

Saturday, 18 June 2016

भानगढ़ किला

           जहां सूरज ढलते ही जाग जाती हैं आत्‍माएं , किले, मौत, हादसों, अतीत और रूहों का अपना एक अलग ही सबंध और संयोग होता है। ऐसी कोई जगह जहां मौत का साया बनकर रूहें घुमती हो उन जगहों पर इंसान अपने डर पर काबू नहीं कर पाता है और एक अजीब दुनिया के सामने जिसके बारें में उसे कोई अंदाजा नहीं होता है, अपने घुटने टेक देता है। दुनिया भर में कई ऐसे पुराने किले है जिनका अपना एक अलग ही काला अतीत है और वहां आज भी रूहों का वास है। [पढ़ें- मसूरी के होटल में जब बेचैन हो जाती है आत्मा] दुनिया में ऐसी जगहों के बारें में लोग जानते है, लेकिन बहुत कम ही लोग होते हैं, जो इनसे रूबरू होने की हिम्‍मत रखतें है।

मालचा महल - दिल्ली का एक गुमनाम महल, जहाँ अवध वंश के राजकुमार और राजकुमारी जी रहे है गुमनाम ज़िंदगी

मालचा महल - दिल्ली का एक गुमनाम महल, जहाँ अवध वंश के राजकुमार और राजकुमारी जी रहे है गुमनाम ज़िंदगी


आज हम आपको दिल्ली के ऐसे गुमनाम महल के बारे में बताते है जिसके बारे में अधिकतर दिल्ली वासी भी नहीं जानते है यह है  दिल्ली के दक्षिण रिज़ के बीहड़ों में छुपा ‘मालचा महल’ जिसमे पिछले 28 सालो से अवध राजघराने के वंशज राजकुमार ‘रियाज़’ (Prince Riaz) और राजकुमारी ‘सकीना महल’ (Princess Sakina Mahal) रह रहे है।   पहले इनके साथ इनकी माँ ‘विलायत महल’ भी रहा करती थी जिन्होंने 10 सितंबर 1993 को आत्महत्या कर ली थी।  इस महल तक जाने का रास्ता सरदार पटेल मार्ग से जाता है। लेकिन इस महल में अंदर जाने की इज़ाज़त किसी को नहीं है। उस महल तक पहुंचने के एक मात्र रास्तेल पर लगा है लोहे का ग्रिल, जिस पर हल्की-सी आहट होते ही  कुत्तेा भौंकना  शुरु कर देते हैं । चारों ओर कंटीली तार के बाड़े से घिरे उस महल के प्रवेश द्वार पर लगे पत्थर पर लिखा है, रूलर्स ऑफ अवध: ‘प्रिंसेस विलायत महल’

Friday, 20 May 2016

लालकिले की लाल दीवारों में सिमटा इतिहास

नई दिल्ली: भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के चश्मदीद गवाह और आजादी के मतवालों के प्रेरणास्रोत रहे ऐतिहासिक लाल किले ने न सिर्फ दिल्ली के उतार-चढ़ावों को करीब से देखा है, बल्कि वह कभी उसके दर्द से कराहता, तो सुखद पलों में खुशियों से झूमता भी रहा है।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सन् 1857 के दौरान अंग्रेजी हुक्मरानों ने आजादी के मतवालों पर ही कहर नहीं ढाया था, बल्कि मुगल बादशाह शाहजहां के शासन काल में बने इस भव्य किले के कई हिस्सों को भी जमींदोज कर वहां सेना की बैरकें और दफ्तर बना दिए थे और इस किले को रोशन करने वाले मुगल सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुरशाह जफर को भी कैद कर रंगून भेज दिया था।

Sunday, 10 April 2016

shree bramha ji mandir

Brahma Mandir History


According to the Hindu scripture Padma Purana, Brahma saw the demon Vajranabha (Vajranash in another version) trying to kill his children and harassing people. He immediately slew the demon with his weapon, the lotus-flower. In this process, the lotus petals fell on the ground at three places, creating 3 lakes: the Pushkar Lake or Jyeshta Pushkar (greatest or first Pushkar), the Madya Pushkar (middle Pushkar) Lake, and Kanishta Pushkar (lowest or youngest Pushkar) lake.

Saturday, 12 September 2015

श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर

Sree Padmanabhaswamy Temple

श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर केरल राज्य के तिरुअनन्तपुरम शहर में स्थित है। यह मंदिर जगत पालक भगवान विष्णु को समर्पित है।
यह मंदिर केरल के प्रसिद्ध धार्मिक स्थानों में से एक है। मान्यता है कि देश में भगवान विष्णु को समर्पित 108 देशम है 
और श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर भी उनमें से एक हैं।
श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर का धार्मिक महत्त्व (Religious Significance of Sree PadmanabhaSwamy Temple)
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु की सबसे पहली प्रतिमा इसी स्थान से मिली थी। जिसके बाद इस स्थान पर भगवान का मंदिर बनवा दिया गया। वह दूसरी एक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर प्रकट होकर तीन स्थानों को वैकुंठ कहा और वही विराजमान हो गए। उन्हीं तीन प्रमुख स्थानों में से एक तिरुअनन्तपुरम है।
श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर का पुनर्निर्माण त्रावनकोर के राजा मार्तण्ड ने करवाया था। इस मंदिर में  द्रविड़ एवं केरल वास्तु कला का मिला जुला प्रयोग देखने को मिलता है। 
श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर में स्थित मूर्ति 
इस मंदिर की एक प्रमुख खासियत है यहां स्थित भगवान विष्णु जी की मूर्ति। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की विशाल मूर्ति विराजमान है। इस मूर्ति में भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन मुद्रा में विराजमान हैं। भगवान विष्णु की विश्राम अवस्था को 'पद्मनाभं' कहा जाता है। इस मूर्ति के कारण ही मंदिर का नाम पद्मनाभ स्वामी पड़ा। एक और चीज जो इस मंदिर को खास बनाती है वह है यहां मौजुद तहखाने। मान्यता है कि मंदिर के संरक्षकों ने लुटेरों से धन की सुरक्षा के लिए कई तिलिस्मी तलघरों में सुरक्षित रखा है, जो आज भी मौजूद है। 
श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर (Sree Padmanabhaswamy Temple)
मंदिर में जानें के लिए है विशेष वस्त्र (Special Clothing to Enter The Temple)
श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर में परिवेश के लिए पुरुषों को धोती तथा महिलाओं का साड़ी पहनना अनिवार्य है। मंदिर में प्रवेश के लिए परिधान मंदिर के ही समीप किराये पर दिए जाते हैं। इसके अलावा इस मंदिर की यह खासियत भी है कि इसमें केवल हिन्दू धर्म के लोग ही प्रवेश कर सकते हैं।
मंदिर में होने वाले वार्षिक उत्सव (Annual Festival of The Temple)
मंदिर में एक पवित्र कुंड और दो मंडप है, जो इस मंदिर के महत्त्व को और अधिक बढ़ा देता है। इस मंदिर में हर वर्ष दो महोत्सव मनाए जाते हैं। यह त्यौहार पंकुनी(मार्च-अप्रैल) और ऐप्पसी (अक्टूबर-नवंबर) महीने में मनाया जाता है। इस दौरान यहां भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है।
Raftaar.in
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काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंगVishvnath Jyotirling

काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग (Vishvnath Jyotirling)
श्री काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग वाराणसी (Kashi Vishwanath Temple, Varanasi) जनपद के काशी नगर में अवस्थित है। कहते है, काशी तीनों लोकों में न्यारी नगरी है, जो भोले बाबा के त्रिशूल पर विराजती है। इस मंदिर को कई बार बनाया गया। नवीनतम संरचना जो आज यहां दिखाई देती है वह 18वीं शताब्दी में बनी थी। कहा जाता है कि एक बार इंदौर की रानी अहिल्या बाई होलकर के स्वप्न में भगवान शिव आए। वे भगवान शिव की भक्त थीं। इसलिए उन्होंने 1777 में यह मंदिर निर्मित कराया।
काशी विश्वनाथ की महिमा (History of Kashi Vishwanath Temple)
काशी भगवान शिव की प्रिय नगरी है। "हर हर महादेव घर-घर महादेव" का जयघोष" काशी के लिए ही किया जाता है। काशी में भगवान शिव विश्वेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग में निवास करते हैं। कहते हैं भगवान शिव के मन में एक बार एक से दो हो जाने की इच्छा जागृत हुई। उन्होंने खुद को रूपों में विभक्त कर लिया। एक शिव कहलाए और दूसरे शक्ति। लेकिन इस रूप में अपने माता-पिता को ना पाकर वह बेहद दुखी थे। उस समय आकाशवाणी ने उन्हें तपस्या करने की सलाह दी। तपस्या हेतु भगवान शिव ने अपने हाथों से पांच कोस लंबे भूभाग पर काशी का निर्माण किया। और यहां विश्वेश्वर के रूप में विराजमान हुए।
मान्यता (Importance of Kashi Vishwanath Temple)
शिव पुराण के अनुसार रोग ग्रस्त स्त्री या पुरुष, युवा हो या प्रौढ़, मोक्ष की प्राप्ति के लिए यहां जीवन में एक बार अवश्य आता है। ऐसा मानते हैं कि यहां पर आने वाला हर श्रद्धालु भगवान विश्वनाथ को अपनी इच्छा समर्पित करता है। काशी क्षेत्र में मरने वाले किसी भी प्राणी को निश्चित ही मुक्ति प्राप्त होती है। कहते हैं जब कोई यहां मर रहा होता है उस समय भगवान श्री विश्वनाथ उसके कानों में तारक मंत्र का उपदेश देते हैं जिससे वह आवागमन के चक्कर से अर्थात इस संसार से मुक्त हो जाता है।
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Thursday, 10 September 2015

KHUSHRO BAGH ALLAHABAD




 KHUSHRO BAGH


About Khusro Bagh


The garden Khusro Bagh is encircled by high walls protecting Khusro Mirza's tomb near the Allahabad Railway Station?. Even though the tourist flow here is substantially low, it remains a highly recommended destination.

This garden has five tombs of the Mughal era. One of these belongs to Prince Khusro, who died in the year 1622; his tomb is made with simple sandstone and excellent quality of fretwork windows. Among the others are the tombs of Shah Begum, Jahangir's first wife, and Nesa Begum, his sister, who died in the year 1604 and 1624, respectively. The interior of Nasa Begum's tomb is very well-maintained. The mausoleum of Tombolan, which is the fourth tomb here, is situated at the centre of the park.

History and Architecture

The three sandstone tombs constructed within the garden exhibit Mughal architecture of finest quality. The design of Sultan Begum's tomb and the prime entrance is attributed to Jahangir's artist to the principal court, Aqa Reza. Initially, Shah Begum was known as Man Bai, who was Raja Bhagvan Das's daughter in Amber. In 1604, the discord between her son and husband made her commit suicide by consuming opium. Aqa Reza designed her tomb in 1606. Later, the terrace plinth of three storeys was also built, which was compared by experts to the fort of Fatehpur Sikri.

After rebelling against his father Jahangir Shah in 1606, Khusro was jailed within the park premises. His tomb is the third tomb present in Khusro Bagh. When he tried to escape in 1622, Jahangir's son Khurram and Khusro's brother had ordered to have him blinded. Later, Khurram was known as Emperor Shah Jahan. The tomb of his sister Nithar Begum is situated between his and his mother's tomb, although it is empty.

Architecturally, the tomb of Nithar Begum is more elaborate compared with the other two. It is located higher than the others, and has rounded scalloped motif on its panels. The ceilings of the rooms are painted with celestial objects like the stars. The walls of the rooms were adorned with floral forms. During the 1857 revolt, Khusro Bagh turned into headquarters that would serve Maulvi Liyakat Ali's sepoys. Later, Ali was made liberated Allahabad's governor. However, after a while, the British took over the garden in a matter of two weeks, ending the mutiny there. The nearby area now carries the name of the garden, Khusro Bagh, and has evolved in a bustling township.

Timings

Khusro Bagh is open from 7 a.m. to 7 p.m. every day. One can take a trip of the garden's premises within 45 minutes to an hour.

Location

The garden is located near the Allahabad Railway Station. The park comes on the GT Road.

How to Reach

This place is easily reachable by an auto-rickshaw or taxi. One can also take a cycle rickshaw one is close to the destination.